The Xposure News – PWD Tender Scam


THE XPOSURE NEWS — बेबाक, बेखौफ, दमदार

स्थान: जयपुर (राज.)
तारीख: 25 मई, 2026
मामला: राजकोषीय डकैती एवं प्रशासनिक कदाचार

कुर्सी छिनी पर ‘कमीशन’ का मोह नहीं छूटा: PWD से APO होने के बाद भी XEn पवन कुलश्रेष्ठ ने पिछले दरवाजे से खोल दिए 2 करोड़ के टेंडर; डिजिटल चाबी और ठेकेदारों के सिंडिकेट का महा-खुलासा!

कदाचार की क्रोनोलॉजी — पढ़ें सरकारी तंत्र की पीठ में छुरा घोंपने की कहानी:

  • अवैध कब्जा: 19 मई को प्रशासनिक आधार पर तगड़ा झटका देकर ‘एपीओ’ (APO) किया गया, लेकिन साहब दो दिनों तक बिना किसी अधिकार के सरकारी दफ्तर की मलाईदार सीट पर कुंडली मारकर बैठे रहे।
  • डिजिटल सेंधमारी: नियमानुसार पावर ‘शून्य’ होने के बावजूद, मुख्यालय की नाक के नीचे चहेती 12 कंपनियों के साथ गोपनीय सांठगांठ कर ₹2 करोड़ से अधिक के वित्तीय टेंडरों को ‘अनलॉक’ कर दिया।
  • बिना चार्ज गायब: किसी कनिष्ठ (J.En/A.En) को विधिवत प्रभार (Charge) सौंपने की जहमत तक नहीं उठाई। कलेक्टरेट और प्रशासनिक हलकों में हड़कंप।
  • फाइलें जब्त: भ्रष्टाचार की दुर्गंध मुख्य अभियंता (Chief Engineer) तक पहुंचते ही टेंडर प्रक्रिया पर तत्काल रोक। 19 मई के बाद के सभी कंप्यूटर लॉग्स, आईपी एड्रेस और डिजिटल फुटप्रिंट्स जब्त!

जयपुर। राजस्थान का सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) इन दिनों एक ऐसे दुस्साहसिक और संगीन प्रशासनिक स्कैम का गवाह बना है, जिसने ब्यूरोक्रेसी के कड़े नियमों और डिजिटल सुरक्षा के दावों को सरेआम चौराहे पर नंगा कर दिया है। जयपुर शहर तृतीय संभाग में तैनात अधिशासी अभियंता (XEn) पवन कुलश्रेष्ठ ने जो खेल खेला है, उसने यह साबित कर दिया है कि जब सरकारी कुर्सी और ठेकेदारों के सिंडिकेट का गठन मजबूत हो, तो उच्च अधिकारियों के आदेश भी रद्दी के टुकड़े बनकर रह जाते हैं। साहब को पद से बेदखल (APO) कर दिया गया, उनके वित्तीय अधिकार छीन लिए गए, लेकिन दो करोड़ रुपए से अधिक के टेंडर कमीशन की जल्दबाजी ऐसी थी कि उन्होंने पिछले दरवाजे से पूरे सिस्टम को ही हैक कर डाला।

जब पावर हुई सीज, तो कहां से आई टेंडर खोलने की औकात?

सरकारी नियमों की किताब साफ कहती है—’आदेश की प्रतीक्षा’ (APO) का मतलब है कि आपके पास अब चपरासी को भी निर्देश देने की कानूनी ताकत नहीं बची है। 19 मई को जब पवन कुलश्रेष्ठ के खिलाफ प्रशासनिक डंडा चला और उन्हें एपीओ किया गया, तो तकनीकी रूप से उसी क्षण से वे वित्तीय और प्रशासनिक रूप से ‘मृतप्राय’ हो चुके थे। वे न तो किसी सरकारी फाइल को छू सकते थे और न ही किसी वित्तीय दस्तावेज पर अपनी कलम चला सकते थे।

लेकिन कानून को जेब में रखने की धमक देखिए! यह अधिकारी 19 मई के बाद भी न सिर्फ दफ्तर में अवैध रूप से हाजिर रहा, बल्कि ठीक दो दिन बाद यानी 21 मई को चुपके से डिजिटल टेंडर विंडो को एक्सेस करता है। वरिष्ठ अधिकारियों को पूरी तरह अंधेरे में रखकर, बिना किसी उच्च प्रशासनिक स्वीकृति के, आनन-फानन में दो करोड़ रुपए से अधिक के अति-महत्वपूर्ण टेंडर खोल दिए जाते हैं। इतनी बेचैनी और इतनी हड़बड़ी? आखिर उन 12 निजी कंपनियों ने साहब को ऐसा क्या ‘प्रलोभन’ दे रखा था कि वे अपनी पूरी नौकरी और इज्जत दांव पर लगाने को तैयार हो गए?

डिजिटल लॉकिंग सिस्टम का जनाजा: आईटी सेल और मॉनिटरिंग विंग की मिलीभगत?

यह मामला केवल एक भ्रष्ट अधिकारी की मनमानी का नहीं है, बल्कि यह पीडब्ल्यूडी के समूचे आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल सुरक्षा पर एक करारा तमाचा है। The Xposure News सीधे तौर पर मुख्यालय के आईटी प्रभारियों और मॉनिटरिंग विंग से जवाब मांगता है:

‘द एक्सपोजर’ के वो तीखे सवाल, जिनका जवाब देते हुए फाइलें कांप रही हैं:

  1. जब 19 मई को पवन कुलश्रेष्ठ को आधिकारिक रूप से हटा दिया गया था, तो उनकी डिजिटल आईडी, डिजिटल सिग्नेचर (DSC Key) और टेंडर एक्सेस राइट्स को तत्काल प्रभाव से ‘ब्लॉक’ या ‘फ्रीज’ क्यों नहीं किया गया?
  2. क्या मुख्यालय की मॉनिटरिंग विंग सो रही थी या फिर इस ‘डिजिटल बाईपास’ के पीछे ऊपर बैठे किसी बड़े मगरमच्छ का हाथ था, जिसने जानबूझकर चाबी खुली छोड़ी?
  3. बिना मुख्यालय को सूचित किए और बिना सक्षम स्तर के अप्रूवल के, ई-टेंडरिंग पोर्टल ने एक सस्पेंड/एपीओ स्तर के अधिकारी के लॉगिन को कैसे स्वीकार कर लिया?

बिना प्रभार (Charge) सौंपे पिछले दरवाजे से ‘कमीशन’ का बंदोबस्त

इस प्रशासनिक धांधली की पराकाष्ठा तो देखिए! पद से हटाए जाने के बाद नियम कहता है कि अधिकारी को अपने जूनियर या मुख्यालय द्वारा अधिकृत किसी अन्य अधिकारी को विधिवत चार्ज (प्रभार) सौंपना होता है। लेकिन एक्सईएन साहब ने किसी को चार्ज देना मुनासिब ही नहीं समझा। कलेक्टरेट और संबंधित प्रशासनिक विंग ने ऑन-रिकॉर्ड पुष्टि की है कि इस सीट का विधिवत चार्ज किसी को ट्रांसफर ही नहीं हुआ था। यानी तकनीकी रूप से एक ‘अनाधिकृत व्यक्ति’ पिछले दरवाजे से सरकारी सिस्टम में घुसपैठ करता है और करोड़ों के टेंडर अपनी चहेती फर्मों की झोली में डाल देता है।

चीफ इंजीनियर का कड़ा रुख: टेंडर प्रक्रिया पर रोक, फाइलें जब्त

जैसे ही इस महा-घोटाले की भनक मुख्य अभियंता (Chief Engineer) के केबिन तक पहुंची, महकमे में भूचाल आ गया। मामला सीधे तौर पर जनता के टैक्स के पैसे और सरकारी टेंडर आवंटन में सरेआम डकैती से जुड़ा था। चीफ इंजीनियर ने बिना वक्त गंवाए सख्त रुख अपनाते हुए उन सभी संदिग्ध 12 कंपनियों के टेंडरों पर आगामी आदेश तक पूरी तरह ‘बैन’ (रोक) लगा दिया है। जांच टीम ने एक्शन में आते हुए सभी डिजिटल लॉग्स, आईपी एड्रेस और फाइलों के मूवमेंट रिकॉर्ड को जब्त कर लिया है।


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