जयपुर। राजस्थान में आगामी स्थानीय निकाय और पंचायतीराज चुनावों को लेकर महिला आरक्षण का एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आ रहा है। पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का प्रावधान है, जबकि नगर निकायों में महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई यानी 33% आरक्षण लागू है।
सवाल यह है कि जब दोनों ही स्थानीय स्वशासन की संस्थाएं हैं, तो महिलाओं को पंचायतों में 50% और नगर निकायों में 33% आरक्षण क्यों?
इसका जवाब राजस्थान के अलग-अलग कानूनों और संविधान में स्थानीय निकायों के लिए किए गए अलग प्रावधानों के साथ-साथ 2010 के राजस्थान हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले में छिपा है।
सबसे पहले समझिए—संविधान क्या कहता है?
भारत के संविधान में पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए अलग-अलग संवैधानिक प्रावधान हैं।
पंचायतीराज संस्थाओं के लिए अनुच्छेद 243-D लागू होता है। वहीं नगरपालिकाओं यानी शहरी स्थानीय निकायों के लिए अनुच्छेद 243-T लागू होता है।
अनुच्छेद 243-T(3) के अनुसार नगरपालिकाओं में प्रत्यक्ष चुनाव से भरी जाने वाली कुल सीटों में कम से कम एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें भी शामिल हैं। सीटों का आवंटन अलग-अलग वार्डों में रोटेशन के आधार पर किया जा सकता है।
यानी संविधान ने नगर निकायों के लिए न्यूनतम 33% महिला आरक्षण सुनिश्चित किया है।
फिर राजस्थान ने पंचायतों में 50% कैसे कर दिया?
राजस्थान ने कानून में संशोधन करके महिलाओं का आरक्षण 33% से बढ़ाकर 50% किया।
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, 1994 की धारा 15 में वर्तमान प्रावधान के अनुसार पंचायतीराज संस्थाओं में प्रत्यक्ष चुनाव से भरी जाने वाली कुल सीटों में कम से कम आधी यानी 50% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।
इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित सीटों में महिलाओं का आरक्षण भी शामिल है।
यह बदलाव Rajasthan Panchayati Raj (Second Amendment) Act, 2008 के जरिए किया गया था।
राजस्थान में पंचायतीराज संस्थाओं के लिए 50% महिला आरक्षण का प्रावधान इसी व्यवस्था के तहत जारी रहा।
नगर निकायों में 50% का प्रावधान भी किया गया था
यहां कहानी थोड़ी अलग है।
राजस्थान में नगरपालिकाओं के कानून में भी महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का प्रावधान किया गया था। इसमें SC, ST और पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित सीटों में से आधी सीटें संबंधित वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान भी था।
लेकिन इस व्यवस्था को अदालत में चुनौती दी गई।
2010 में हाईकोर्ट ने क्या कहा?
राजस्थान हाईकोर्ट में Manak Chand और Mohd. Kaleem से जुड़े मामलों में नगरपालिकाओं में 50% महिला आरक्षण वाले संशोधन को चुनौती दी गई।
5 मार्च 2010 को डबल बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 14 और 243-T के संदर्भ में 50% आरक्षण की संवैधानिक वैधता पर विचार किया।
फैसले में कोर्ट ने कहा कि संविधान नगरपालिकाओं में महिलाओं के लिए कम-से-कम एक-तिहाई आरक्षण देता है। राज्य इससे अधिक आरक्षण दे सकता है, लेकिन वह अनुपातहीन या अत्यधिक नहीं होना चाहिए।
कोर्ट ने यह भी माना कि सरकार के पास महिलाओं के अनुपात को देखते हुए 50% आरक्षण को उचित ठहराने वाला पर्याप्त आधार/आंकड़ा नहीं था। इसी आधार पर नगरपालिका कानून में किया गया 50% आरक्षण वाला संशोधन निरस्त कर दिया गया।
पंचायतों में 50% महिला आरक्षण का प्रावधान कायम रहा, जबकि नगरपालिकाओं में 50% का प्रावधान 2010 के हाईकोर्ट फैसले के बाद टिक नहीं पाया।
एक बड़ी कानूनी गलती से बचिए—243-D नहीं, 243-T
इस पूरे विषय में एक कानूनी बारीकी बेहद महत्वपूर्ण है। नगर निकायों के महिला आरक्षण के संदर्भ में कई बार अनुच्छेद 243-D का उल्लेख कर दिया जाता है, जबकि यह सही नहीं है।
- अनुच्छेद 243-D → पंचायतीराज संस्थाओं में आरक्षण
- अनुच्छेद 243-T → नगरपालिकाओं में आरक्षण
इसलिए नगर निकायों में 50% महिला आरक्षण की कानूनी चर्चा करते समय अनुच्छेद 243-T का संदर्भ देना चाहिए।
SC, ST और OBC महिलाओं का आरक्षण कैसे जुड़ेगा?
महिला आरक्षण केवल सामान्य सीटों तक सीमित नहीं है। पंचायतीराज अधिनियम में SC, ST और Backward Classes के लिए आरक्षित सीटों में से कम से कम आधी सीटें संबंधित वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है।
कुल मिलाकर पंचायतों में प्रत्यक्ष चुनाव वाली सीटों का कम से कम आधा हिस्सा महिलाओं के लिए आरक्षित है।
नगरपालिकाओं में भी कानून में SC, ST और Backward Classes के लिए आरक्षित सीटों में से आधी सीटें संबंधित वर्ग की महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है। हालांकि महिलाओं का कुल आरक्षण संवैधानिक न्यूनतम एक-तिहाई के दायरे में है।
लॉटरी और रोटेशन का क्या मतलब है?
महिला आरक्षण का अर्थ यह नहीं है कि हर चुनाव में वही वार्ड या सीट महिला के लिए आरक्षित रहेगी।
संविधान और संबंधित कानूनों में आरक्षित सीटों को अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में रोटेशन से आवंटित करने का प्रावधान है। इसलिए चुनाव से पहले होने वाली आरक्षण लॉटरी बेहद महत्वपूर्ण होती है।
किस वार्ड में महिला, किस वार्ड में SC महिला, किसमें ST महिला या OBC महिला की सीट आएगी— यह आरक्षण निर्धारण और रोटेशन की प्रक्रिया से तय होता है।
क्या राजस्थान के नगर निकायों में 50% महिला आरक्षण हो ही नहीं सकता?
ऐसा कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि इसे कभी 50% नहीं किया जा सकता। संविधान का अनुच्छेद 243-T नगरपालिकाओं में कम से कम एक-तिहाई महिला आरक्षण अनिवार्य करता है। साथ ही राज्य विधानमंडल को स्थानीय निकायों में आरक्षण के संबंध में कानून बनाने की गुंजाइश है।
लेकिन राजस्थान में 50% नगरपालिका महिला आरक्षण का पिछला प्रयास न्यायिक जांच में निरस्त हो चुका है।
इसलिए इसे केवल यह कहकर समझाना कि “संविधान के अनुच्छेद 243-D में संशोधन किए बिना 50% संभव नहीं है” सही कानूनी प्रस्तुति नहीं होगी।
नगर निकायों का संवैधानिक आधार अनुच्छेद 243 T है। राजस्थान में नगर निकायों में 50% महिला आरक्षण का पिछला प्रावधान 2010 के हाईकोर्ट फैसले में निरस्त किया गया था।
देश में राजस्थान की तस्वीर क्या है?
कई राज्यों ने स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 50% आरक्षण का प्रावधान किया है। इसलिए 33% कोई संवैधानिक अधिकतम सीमा नहीं है। नगरपालिकाओं के मामले में संविधान का मूल प्रावधान कम से कम एक-तिहाई महिला आरक्षण का है। राज्य कानून इसके आगे जा सकता है, लेकिन राजस्थान में 50% नगरपालिका आरक्षण का पिछला प्रयास न्यायिक जांच में निरस्त हो चुका है।
एक नजर में पूरा फर्क
| मुद्दा | पंचायतीराज | नगर निकाय |
|---|---|---|
| संवैधानिक अनुच्छेद | 243-D | 243-T |
| महिलाओं का मौजूदा प्रावधान | 50% | कम से कम 33% |
| कानूनी आधार | राजस्थान पंचायती राज अधिनियम, धारा 15 | राजस्थान नगरपालिकाएं अधिनियम, धारा 6 + संविधान |
| SC/ST/OBC महिलाओं का आरक्षण | संबंधित आरक्षित सीटों में महिला आरक्षण | संबंधित आरक्षित सीटों में महिला आरक्षण |
| सीटों का रोटेशन | हां | हां |
| 50% का ऐतिहासिक विवाद | 2008 में 50% प्रावधान | 50% प्रावधान पर 2010 में हाईकोर्ट का फैसला |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
निष्कर्ष: राजस्थान में पंचायत और नगर निकाय चुनावों में महिला आरक्षण का अंतर किसी एक चुनावी फैसले का परिणाम नहीं है। इसके पीछे दो अलग संवैधानिक प्रावधान, राज्य के अलग-अलग कानून और 2010 का राजस्थान हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला है।
इसलिए आने वाले चुनावों में यदि किसी को पंचायत में 50% महिला आरक्षण और नगर निकाय में 33% महिला आरक्षण दिखाई देता है, तो इसके पीछे की कानूनी कहानी यही है।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य: नगर निकायों के 50% आरक्षण के संदर्भ में अनुच्छेद 243-D नहीं, बल्कि 243-T प्रासंगिक है।
वहीं उपलब्ध हाईकोर्ट फैसले के अनुसार 50% नगरपालिका महिला आरक्षण से जुड़ा निर्णय 5 मार्च 2010 का है।
