पाँचना बाँध की नहरों में पानी छोड़ने की मांग को लेकर खंडीप में किसानों का धरना 12वें दिन भी जारी,
27 जून तक दिया अल्टीमेटम; हाईकोर्ट के आदेशों की पालना की मांग तेज।

खंडीप। पाँचना बाँध से कमांड क्षेत्र की नहरों में पानी छोड़े जाने की मांग को लेकर खंडीप में चल रहा किसान आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। धरने के 12वें दिन भी हजारों किसान, महिलाएं, युवा और बुजुर्ग आंदोलन स्थल पर डटे रहे। आंदोलनकारियों ने काली पट्टी बांधकर सरकार और प्रशासन के खिलाफ विरोध जताया तथा चेतावनी दी कि यदि 27 जून तक नहरों में पानी नहीं छोड़ा गया तो 28 जून से आंदोलन को और व्यापक स्वरूप दिया जाएगा।

धरना स्थल पर किसानों ने आरोप लगाया कि माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद अब तक नहरों में पानी नहीं छोड़ा गया है। उनका कहना है कि भीषण गर्मी के बीच हजारों किसान अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं, लेकिन सरकार उनकी मांगों को लगातार नजरअंदाज कर रही है।

आंदोलन को मिल रहा व्यापक जनसमर्थन

मंगलवार को महस्वा गांव के किसान और ग्रामीण बड़ी संख्या में धरना स्थल पर पहुंचे तथा आंदोलन को समर्थन दिया। संघर्ष समिति के अनुसार बुधवार को कैमला गांव के किसान भी आंदोलन में शामिल होंगे।

प्रशासन और किसानों के बीच महत्वपूर्ण वार्ता

राजीव गांधी सेवा केंद्र, खंडीप में प्रशासनिक अधिकारियों और पाँचना कमांड एरिया विकास संघर्ष समिति के बीच महत्वपूर्ण वार्ता हुई। बैठक में गंगापुर सिटी विधायक रामकेश मीणा, संघर्ष समिति अध्यक्ष बटुआ पटेल, 88 गांवों के पंच-पटेल, जिला कलेक्टर कानाराम, पुलिस अधीक्षक ज्येष्ठा मैत्रेयी सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

“अब आगे की बातचीत केवल सरकार स्तर के प्रतिनिधियों से ही की जाएगी।”

संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि स्थानीय स्तर पर कई दौर की वार्ताओं के बावजूद कोई ठोस समाधान नहीं निकला है। किसानों ने एक स्वर में पाँचना बाँध से कमांड क्षेत्र की नहरों में पानी छोड़े जाने की मांग दोहराई।

27 जून तक अल्टीमेटम

संघर्ष समिति ने सरकार को 27 जून तक का समय देते हुए चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय तक नहरों में पानी नहीं छोड़ा गया तो 28 जून से आंदोलन को और व्यापक तथा उग्र रूप दिया जाएगा। समिति ने कहा कि इसके बाद उत्पन्न होने वाले हालात की जिम्मेदारी सरकार और प्रशासन की होगी।

20 वर्षों से पानी की आस

किसानों का कहना है कि कमांड क्षेत्र के लोग पिछले करीब 20 वर्षों से नहरों में पानी आने का इंतजार कर रहे हैं। पानी के अभाव में हजारों बीघा कृषि भूमि बंजर होती जा रही है, जबकि किसान, पशुपालक और ग्रामीण गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं।

जल संकट का असर केवल खेती तक सीमित नहीं है, बल्कि पशु-पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के जीवन पर भी गंभीर रूप से पड़ रहा है।

सरकार पर राजनीति करने का आरोप

आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि पानी जैसे गंभीर जनहित के मुद्दे पर राजनीति की जा रही है। उनका कहना है कि 35 से 40 हजार लोग आंदोलन से जुड़े हुए हैं, लेकिन उनकी आवाज सुनने वाला कोई नहीं है।


अब पूरे क्षेत्र की निगाहें 27 जून पर टिकी हैं।

यदि तब तक कोई समाधान नहीं निकलता है तो 28 जून से आंदोलन के और अधिक उग्र होने की संभावना जताई जा रही है। आने वाले दिनों में यह आंदोलन क्षेत्र की राजनीति और प्रशासन दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

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