Special Report राजस्थान संवाद में बड़ा खेल: चहेती फर्म को फायदा पहुंचाने के लिए बीच खेल में बदल डाले टेंडर के नियम

जयपुर। राजस्थान संवाद में आउटडोर मीडिया सेवाओं के लिए निकाले गए करोड़ों रुपए के टेंडर में बड़े स्तर पर धांधली और खेल होने का सनसनीखेज मामला सामने आया है। विभाग के आला अधिकारियों ने अपनी एक चहेती फर्म को उपकृत करने (फायदा पहुंचाने) के लिए टेंडर जारी होने के बाद, पूरी प्रक्रिया के बीच में ही नियमों और योग्यताओं में भारी फेरबदल कर दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स और सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, टेंडर के नियमों और शर्तों में ढील देने का यह पूरा खेल ‘स्वास्तिक प्रिंटर्स’ नामक फर्म को बैकडोर एंट्री दिलाने के लिए रचा गया। बताया जा रहा है कि यह फर्म सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक कद्दावर प्रवक्ता के भाई की है। विभाग द्वारा 08 अप्रैल 2026 को जारी किए गए नए शुद्धिपत्र (Corrigendum) की प्रति सामने आने के बाद अब इस पूरी टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता और साख पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं

आमतौर पर सरकारी टेंडर प्रक्रियाओं में शुचिता और पारदर्शिता बनाए रखने के लिए नियमों को कड़ा रखा जाता है, ताकि योग्य कंपनियों को ही काम मिले। लेकिन राजस्थान संवाद के कार्यकारी निदेशक (वित्त) के हस्ताक्षरों से जारी इस नए संशोधित आदेश ने टेंडर की बुनियादी और सबसे महत्वपूर्ण शर्तों को ही पूरी तरह से ढीला और कमजोर कर दिया है।


टर्नओवर की शर्त: 6 करोड़ से घटाकर सीधे 4 करोड़ की गई

टेंडर के मूल नियमों और शर्तों (Section III, Evaluation and Qualification Criteria) के अनुसार, इस काम के लिए आवेदन करने वाली कंपनी का पिछले तीन वित्तीय वर्षों (FY 2022-23, FY 2023-24 और FY 2024-25) का औसत वार्षिक टर्नओवर कम से कम 6 करोड़ रुपए होना अनिवार्य किया गया था। चूंकि इस पूरे टेंडर की कुल अनुमानित लागत लगभग 40 करोड़ रुपए है, इसलिए विभाग का 6 करोड़ रुपए के न्यूनतम टर्नओवर की शर्त रखना बेहद तार्किक और नियमानुकूल था।

राजस्थान संवाद टेंडर घोटाला

लेकिन चहेती फर्म को अवांछित राहत देने के लिए नए संशोधित आदेश में इस बड़ी शर्त को अचानक घटाकर सीधे 4 करोड़ रुपए कर दिया गया। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि जो कंपनियां पहले कम टर्नओवर होने के कारण इस रेस से बाहर हो रही थीं, उनके लिए विभाग ने खुद आगे बढ़कर नियमों को कमजोर करते हुए रास्ता साफ कर दिया।

अनुभव के नियम बदले: 3 साल की अवधि को बढ़ाकर किया 4 साल

इस टेंडर प्रक्रिया में सबसे चौंकाने वाला और संदेहास्पद बदलाव अनुभव (Experience) और वर्क ऑर्डर की शर्तों में किया गया है। मूल नियमों के तहत यह प्रावधान था कि आवेदन करने वाली फर्म के पास पिछले 3 वित्तीय वर्षों में कम से कम 1 करोड़ रुपए का कोई एक सिंगल वर्क ऑर्डर (Single Work Order), या फिर 50-50 लाख रुपए के दो वर्क ऑर्डर, अथवा 25-25 लाख रुपए के चार वर्क ऑर्डर होने अनिवार्य थे। इसके साथ ही संबंधित काम के सफलतापूर्वक पूर्ण होने का प्रमाण पत्र (Completion Certificate) देना भी जरूरी था।

राजस्थान संवाद टेंडर घोटाला

परंतु, संशोधन के नाम पर इस पूरी शर्त को ही पलट दिया गया। नए आदेश के तहत अब 3 साल की इस अनुभव अवधि को बढ़ाकर 4 साल (FY 2025-26 को भी शामिल करते हुए) कर दिया गया है। इसके साथ ही अब सिंगल या तयशुदा वर्क ऑर्डर की अनिवार्य बाध्यता को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। नया नियम यह बना दिया गया कि पिछले 4 सालों में कुल मिलाकर (Aggregate) 1 करोड़ रुपए का काम होना चाहिए, बशर्ते कोई भी सिंगल वर्क ऑर्डर 20 लाख रुपए से कम का न हो।

इस अभूतपूर्व ढील से यह साफ झलकता है कि जिस विशिष्ट फर्म के पास तय समय-सीमा के भीतर बड़े काम करने का कोई अनुभव नहीं था, उसे बैकडोर एंट्री देने के लिए सालों की संख्या को बढ़ा दिया गया और काम के आकार (वैल्यू) को छोटा कर दिया गया।

गुणवत्ता से समझौता: सनबोर्ड-II की टेक्निकल स्पेसिफिकेशन ही डिलीट की

नियमों में हेरफेर यहीं नहीं रुका; इसके अलावा ‘सनबोर्ड-II’ (Section II) की तकनीकी स्पेसिफिकेशन्स (Technical Specifications) को नए आदेश में सीधे तौर पर निरस्त (Delete) कर दिया गया। मूल टेंडर में इसके तहत 5mm की मोटाई, 0.39 या उससे अधिक की डेंसिटी, यूवी फोर-कलर प्रिंटिंग (UV Four-Color Printing) और मशीन साइज जैसी बेहद महत्वपूर्ण गुणवत्ता शर्तें शामिल थीं।

राजस्थान संवाद टेंडर घोटाला

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी टेंडर से गुणवत्ता के ऐसे कड़े मानकों को इस तरह पूरी तरह से हटा देना, सीधे तौर पर काम की क्वालिटी से समझौता करने और किसी खास वेंडर को अनुचित लाभ पहुंचाने की तरफ स्पष्ट इशारा करता है।

यूवी लेमिनेशन के करोड़ों के भुगतान पर खड़े हुए सवाल

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद पेपर प्रिंटिंग करने वाली फर्मों को किए गए UV लेमिनेशन के भुगतान पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। हकीकत यह बताई जा रही है कि किताबों पर UV लेमिनेशन जैसा कोई भी वास्तविक काम हुआ ही नहीं था। इसके बावजूद यह भुगतान करीब 200 करोड़ रुपए का है। इतना ही नहीं, इन्हीं फर्मों को 5 करोड़ रुपए से अधिक का अतिरिक्त भुगतान करके पेपर खरीदा गया।

प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि पिछले कई वर्षों से पेपर प्रिंटिंग के खेल में मिलीभगत करके, कुछ अधिकारियों के 5 करीबियों और रिश्तेदारों की फर्मों की सहूलियत व शर्तों को ध्यान में रखकर ही टेंडर के ड्राफ्ट तैयार किए जाते हैं और हर बार उन्हीं को इस टेंडर प्रक्रिया में शामिल कर फायदा पहुंचाया जाता है।

प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप, निष्पक्ष जांच की मांग

सरकारी टेंडरों में ऐन वक्त पर नियमों को इतना अधिक लचीला और कमजोर बनाना प्रशासनिक हलकों में भारी चर्चा और विवाद का विषय बना हुआ है। विज्ञापन जगत से जुड़े जानकारों और विशेषज्ञों का साफ कहना है कि जब सरकार 40 करोड़ रुपए का इतना बड़ा और महत्वपूर्ण काम कराने जा रही है, तो तकनीकी और वित्तीय शर्तों को और मजबूत करने के बजाय इतना लाचार क्यों किया गया? क्या राजस्थान संवाद में बिना किसी ऊंचे राजनैतिक रसूख या ‘ऊपर’ की शह के इतना बड़ा फेरबदल संभव है?

पारदर्शिता को पूरी तरह ताक पर रखकर चहेती कंपनियों को करोड़ों का टेंडर सौंपने की इस कथित साजिश के सामने आने के बाद, अब इस पूरे मामले की किसी स्वतंत्र एजेंसी से निष्पक्ष जांच कराने की मांग तेजी से उठने लगी है।


जानिए क्या होता है ‘आउटडोर मीडिया’ का काम?

आम जनता की समझ के लिए बता दें कि अगर आपने किसी सार्वजनिक स्थान, सड़क या चौराहे पर कभी कोई बड़ा बिलबोर्ड, बस स्टॉप पर कोई विज्ञापन या किसी व्यस्त चौक में डिजिटल स्क्रीन पर कोई संदेश या सरकारी योजना का प्रचार देखा है, तो यह सब ‘आउटडोर विज्ञापन’ (Outdoor Advertising) की श्रेणी में आता है। यानी ऐसा विज्ञापन, जो लोगों तक पहुंचता है जब वे घरों से बाहर सार्वजनिक दुनिया में होते हैं।

आउटडोर मीडिया के तहत मुख्य रूप से इन विज्ञापनों को शामिल किया जाता है:

  • बिलबोर्ड और होर्डिंग्स: शोरूम, दुकानों, प्रमुख चौराहों और पारंपरिक राजमार्गों (Highways) पर लगने वाले विशाल इलेक्ट्रॉनिक्स पोस्टर या लोहे के बोर्ड।
  • डिजिटल बिलबोर्ड: आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन जिन पर कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित विज्ञापन, स्लाइड या वीडियो समय-समय पर बदलते रहते हैं।
  • ट्रांज़िट मीडिया: ऑटोमोबाइल, टैक्सियों, ट्रकों, बसों और ऑटो-कैरिप के बाहरी हिस्सों पर पेंट किए गए या रैप (Wrap) किए गए विज्ञापन।
  • मेट्रो/रेलवे और एयरपोर्ट विज्ञापन: रेलवे स्टेशनों, मेट्रो स्टेशनों और हवाई अड्डों के अंदर व बाहर की दीवारों पर लगे बैनर, डिजिटल झंडे, ग्लोसाइन बोर्ड और पोस्टर।
  • स्ट्रीट बस शेल्टर: आम जनता के खड़े होने वाले बस स्टॉप की दीवारों, पिलर्स या छतों पर किए जाने वाले विज्ञापन।
  • कियोस्क और पोल: सड़कों के किनारे लगे बिजली या स्ट्रीट लाइट के खंभों पर लगाए जाने वाले छोटे विज्ञापन बॉक्स।
  • बेंच, पार्क और सार्वजनिक स्थान: पार्कों या सार्वजनिक स्थलों पर लोगों के बैठने की कुर्सियों और सार्वजनिक सुविधाओं के पास लगे विज्ञापन समूह।
  • स्ट्रेंथ और प्वाइंट ऑफ सेल मीडिया: बड़े मॉल्स, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स, मर्चेंडाइज स्टोर्स और सुपरमार्केट के बाहर ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए लगाए जाने वाले बड़े पैमाने के बोर्ड, बैनर और नियॉन साइन (Neon Signs)।
  • वॉल पेंटिंग (दीवार पेंटिंग): स्थानीय स्तर पर ब्रांडिंग और प्रचार के लिए शहरों की प्रमुख दीवारों, सरकारी इमारतों और फ्लाईओवरों व पुलों पर की जाने वाली पेंटिंग।
  • प्रचार वाहन (Mobile Display Vans): सुपरमार्केट या प्रमुख बाजारों में घूमने वाली गाड़ियां जिन पर बड़ी डॉक्यूमेंट्री स्क्रीन या लाउडस्पीकर लगे होते हैं, जो सरकारी मंजूरियों और योजनाओं का प्रचार-प्रसार करती हैं।
  • हॉट एयर बैलून: बड़े सरकारी आयोजनों, प्रदर्शनियों या मेलों के दौरान हवा में तैरते छोड़े जाने वाले विशाल विज्ञापन बैलून।


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