राजस्थान में गोवंश संरक्षण के नाम पर सरकार ने बीते दो वर्षों में करीब 1380 करोड़ रुपये का गो-सेस (Go Cess) वसूला है

राजस्थान में गौवंश संरक्षण के नाम पर सरकार ने बीते दो वर्षों में करीब 1380 करोड़ रुपये का गो-सेस (Go Cess) वसूला है। यह राशि शराब बिक्री सहित अन्य स्रोतों से जुटाई गई, ताकि प्रदेश की हजारों गोशालाओं को आर्थिक सहारा मिल सके। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य की लगभग 3500 गोशालाओं को इस फंड से सहायता दी जा रही है। चारा, पानी, दवाइयों और रख-रखाव जैसे खर्चों के लिए यह राशि महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी वसूली के बावजूद क्या गोवंश की स्थिति वास्तव में सुधरी है? वसूली कई जगह से, राहत कितनी? राज्य में जनता पर अलग-अलग माध्यमों से आर्थिक भार डाला जा रहा है—शराब पर सेस, स्टांप ड्यूटी, अन्य राजस्व स्रोत. इसके बावजूद कई इलाकों में सड़कों पर बेसहारा गाय-सांड को देखा जा सकता है. गाय-सांड की मृत्यु के बाद उन्हें डंपिंग यार्ड में फेंक दिया जाता है. कुत्तों के द्वारा उनके मृत शरीर को नोचते हुए भी देखा जा सकता है. बेसहारा सांड की वजह से कई लोग अपनी जान भी गँवा चुके हैं. फिर ये 1300 करोड़ रुपए कहाँ गए. गौशालाओं की मॉनिटरिंग में सरकार फैल दिखाई दे रही है.

गौशालाओं में चारे की कमी, पानी का संकट और संसाधनों की तंगी की खबरें सामने आती रही हैं।जमीनी हकीकत क्या कहती है? कुछ गोशाला संचालकों का कहना है कि सहायता मिलती जरूर है, लेकिन—जरूरत के मुकाबले अपर्याप्त. कई बार समय पर नहीं पहुंचती.

बढ़ती लागत से संचालन मुश्किल – नीति पर बहस यह स्थिति एक नई बहस को जन्म देती है—👉 क्या गोसेवा का आधार शराब से होने वाली कमाई होना चाहिए?

👉 क्या भारी वसूली के बाद भी व्यवस्थाएं मजबूत नहीं हो पाईं?

👉 और आखिर इस पैसे का असर जमीन पर कितना दिख रहा है?

जवाबदेही जरूरी – गौवंश संरक्षण केवल आर्थिक घोषणा नहीं, बल्कि प्रभावी क्रियान्वयन भी मांगता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता, निगरानी और दीर्घकालीन नीति के बिना समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!